किताब 'आज रच्यो है बसंत निजाम घर' पर कई लोगों ने महत्वपूर्ण समीक्षाएं लिखी हैं.
कुछ वीडियो में भी हैं.
Many people have written important review on the book 'Aaj Rachyo Hai Basant Nijam Ghar'. Some are in video too.
Suman Mishra (Facebook)
सूफ़ी बसंत: रूहानी रंगों का आख्यान
(यूसुफ़ सईद साहब की पुस्तक "आज रच्यो है बसंत निज़ाम घर")
भारतीय संस्कृति में कुछ परंपराएँ ऐसी हैं जो अपनी यात्राओं के कारण महत्वपूर्ण हो जाती हैं। वे नदियों की तरह होती हैं-एक स्रोत से निकलती हैं, परंतु अपने मार्ग में अनेक मिट्टियों का स्वाद, अनेक आस्थाओं की नमी और अनेक भाषाओं की गूँज अपने भीतर समेट लेती हैं। बसंत की सूफ़ियाना परंपरा भी ऐसी ही एक नदी है। यूसुफ़ सईद की पुस्तक "आज रच्यो है बसंत निज़ाम घर" इसी नदी का सांस्कृतिक भूगोल प्रस्तुत करती है। यह उन अदृश्य पुलों को भी पहचानती है जिन पर चलते हुए भारतीय समाज ने ऋतु को रस्म, रंग को रूहानियत और लोक को लय में बदल दिया।
यह पुस्तक पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि लेखक उन बीजों की खोज कर रहे हैं जिनसे भारतीय सूफ़ी संस्कृति का एक विशाल वृक्ष विकसित हुआ। उस वृक्ष की जड़ें भारतीय लोक-संवेदना में हैं, तना सूफ़ी आध्यात्मिकता का है और उसकी शाखाओं पर पीले फूलों की तरह कविताएँ, गीत और सामूहिक स्मृतियाँ खिली हुई हैं।
पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि यह बसंत को किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक समुदाय की संपत्ति नहीं बनने देती। लेखक दिखाते हैं कि दिल्ली की ख़ानक़ाहों, विशेषतः हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की परंपरा में बसंत आध्यात्मिक उल्लास का रूपक बन गया। लोक की पीली सरसों जब दरगाह की चौखट तक पहुँची तो उसे एक नई रूहानी प्रतिध्वनि मिल गई। इस प्रक्रिया में भारतीय इस्लामी संस्कृति ने ग्रहणशीलता का जो उदाहरण प्रस्तुत किया, वह इस पुस्तक का केंद्रीय बौद्धिक प्रतिपाद्य है।
यूसुफ़ सईद इतिहास को स्मृतियों के वृत्तों में पढ़ते हैं। यही कारण है कि पुस्तक का कथ्य लोक कथाओं, सूफ़ी आख्यानों, सांस्कृतिक परंपराओं और जीवित अनुष्ठानों के बीच संवाद स्थापित करता है। लेखक का आग्रह यह है कि सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी समाज के आत्मबोध का उतना ही महत्त्वपूर्ण हिस्सा होती हैं जितने अभिलेख।
पुस्तक का दूसरा बड़ा आकर्षण इसमें संकलित बसंत-विषयक सूफ़ी काव्य है। ये रचनाएँ पूरी पुस्तक में धड़कते हुए हृदय का काम करती हैं। अमीर ख़ुसरो से लेकर अन्य सूफ़ी कवियों तक, बसंत यहाँ मिलन, विरह, फ़ना और इश्क़-ए-हक़ीक़ी का रूपक बनकर उपस्थित होता है। पीला रंग खेतों से उठकर आध्यात्मिक अनुभूति का रंग बन जाता है; फूल साधक के अंतर्मन में प्रस्फुटित होते हैं। इस प्रकार कविता और इतिहास एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं-एक तथ्य को संवेदना देता है, दूसरा संवेदना को संदर्भ।
भाषा की दृष्टि से भी यह पुस्तक उल्लेखनीय है। यूसुफ़ सईद की शैली अकादमिक अनुशासन और सांस्कृतिक आत्मीयता के बीच संतुलन स्थापित करती है। वे न तो शोध को बोझिल होने देते हैं, न ही भावुकता को विवेक पर हावी होने देते हैं। इस संतुलन के कारण पुस्तक शोधार्थियों, इतिहासकारों, साहित्य के विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों-सभी के लिए समान रूप से उपयोगी बनती है।
यदि इस पुस्तक पर कोई आलोचनात्मक टिप्पणी की जाए तो केवल यह कि कुछ प्रसंगों में अनुवाद थोड़े और बेहतर हो सकते थे उदाहरनार्थ – पुस्तक के अंत में पाब्लो नेरुदा का यह उद्धरण कि – “तुम सारे फूल काट सकते हो मगर बसंत को आने से नहीं रोक सकते” – यह अनुवाद थोडा निराश करता है । फूल तोड़े जा सकते हैं, नष्ट किए जा सकते हैं लेकिन फूलों को काटना अटपटा सा लगता है। किंतु यह अपेक्षा पुस्तक की उपलब्धियों को कम नहीं करती; बल्कि उसके द्वारा खोले गए विमर्श की संभावनाओं की ओर संकेत करती है।
"आज रच्यो है बसंत निज़ाम घर" यह स्मरण कराती है कि सभ्यताएँ गीतों, फूलों, ऋतुओं और साझा उत्सवों से भी आकार ग्रहण करती हैं। यह पुस्तक बसंत का इतिहास लिखते-लिखते भारतीय बहुलता का भी इतिहास लिख देती है।
यूसुफ़ सईद की यह कृति हमारे समय में इसलिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह इतिहास के भीतर छिपे संवादों को पुनः सुनना सिखाती है। यह बताती है कि ख़ानक़ाह की चौखट पर पहुँचा हुआ बसंत भारतीय संस्कृति के हृदय में सह-अस्तित्व की एक नई कोंपल का फूटना भी था। यही इस पुस्तक का सबसे स्थायी और सबसे सुंदर रूपक है।
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लतिका जाधव, पुणे (Latika Jadhav, Pune)
मनुष्य प्रकृति का अटूट हिस्सा है। प्राचीन काव्य के रचयिता प्रायः प्रकृति के निकट रहे थे। इसलिए उस समय में घटित घटनाओं पर आज आश्चर्य होता है। जैसे कि, अपने पीर को मनाने के लिए लिया गया अमीर ख़ुसरो का वह पीला बसंती स्त्री बेष बसंत के उत्सव में कैसे बदल गया? और कैसे यह बसंत का उत्सव हिंदुस्तानी दरगाहों पर आजतक एक यादगार बना हैं? अपने पीर को शोक मुक्त करने के लिए अमीर ख़ुसरो का वह बसंती वेष जो निजामुद्दीन औलिया को मुस्कुराने पर मजबूर कर गया था।
सूफ़ियों के इस बसंत का इतिहास और बदलते समय की चुनौतियों पर भाष्य करती सुंदर रंगीन आवरण और कलात्मक सजावट से बनी यह ले. यूसुफ़ सईद की 'आज रच्यो है बसंत निजाम घर' किताब है।
इस किताब से सूफी पंथ की रूहानी प्रेम धारा का परिचय होता है। दस शीर्षकों के आलेखों से बसंत जो इस कृषि भूमि का आनंदोत्सव है, पाठकों को परिचित होता जाता है। अक्षरों का बड़ा आकार और दिये गए सुंदर मध्यकालीन रंगीन चित्रों से हिंदुस्तानी लोकोत्सव की जनप्रियता गहराई से स्पष्ट होती हैं। किताब की भाषा सहज और प्रवाही है।
‘एक बस्ती एक इतिहास’ दिल्ली की पुरानी निजामुद्दीन बस्ती का नक्शा है। पढ़ते हुए आंखों के सामने सब दृश्यमान होता जाता है। यहाँ निजामुद्दीन औलिया के साथ उस जमाने के खास लोगों की कब्रें है। इन सबके नाम और वहाँ जो वास्तुकला है, हर चीज़ का वर्णन मिलता है। सबसे बड़ी बात सात सौ सालों से अभी तक पानी देने वाली निजामुद्दीन बावली (कुआँ) का ज़िक्र है। श्रद्धालुओं के लिए यह बावली तीर्थ के समान है।जो कोई इस जगह जाना चाहता है, तो उनके लिए यह जानकारी जरूर मददगार साबित होगी। हेरीटेज वॉक जैसा ही इस भाग का प्रस्तुतीकरण है।
इस किताब में हल्की फुल्की तर्क - विचारों से लिखी बातें हमारे बढ़ते आपसी दायरों को भी नापती है। रंगों को धर्म से जोड़कर, भाषा को लेकर हम अपनी मिलीजुली विरासत को खो रहे है। इस बात पर खुलकर नर्म शैली में विषाद भी व्यक्त होता दिखाई देता है।
'ख़ुसरो और निजामुद्दीन औलिया का इश्क़ियां रंग' पढ़ते हुए सूफीवाद और इस्लाम के आक्षेप पर विश्लेषण किया है।इस्लाम में सूफ़ी पंथ पर कुछ बहस भी है।सूफ़ीवाद में सूफी के लिए मृत्यु परमात्मा से मिलन का अंतिम चरण होता है। जो एक मिलन या परमात्मा से विवाह जो उर्स के रूप में मनाया जाता है। सूफ़ी परंपराओं में उर्स जो मूलतः अरबी भाषा का शब्द उरोस से लिया है। उर्स का अर्थ विवाह। मृत्यु परमात्मा से मिलन का दिवस।
अमीर ख़ुसरो (1254-1324) मूलतः एक दरबारी कवि और अनेक कला गुणों के धनी थे। उनकी स्वामी निष्ठा अपने हुक्मरानों के प्रति प्रामाणिक थी। उनके चतुर व्यक्तित्व में अनेक विशेषताएं थी। अमीर ख़ुसरो अपने हुक्मरानों की स्तुति में काफी अतिशयोक्तिपूर्ण लिखते रहे।वह अपने हुक्मरानों के विरोधीयों पर अप्रस्तुत सा लिखते रहे। राजाओं के दरबार में नियुक्ति और उनकी स्तुति करना यह उनके चरितार्थ का साधन ही था। लेकिन फिर भी वह अपने आप को 'हिंदुस्तानी तूती' ही कहलाते रहे। आज उनके हुक्मरानों के नाम तो केवल शुष्क इतिहास के पन्नों पर लिखे है।लेकिन अमीर ख़ुसरो अपने पीर के साथ गरीबों, दुखियारों के मन में बसे हैं। कवि के रूप में विश्व की अनेक भाषाओं की किताबों में वे दर्ज हो चुके है।
तो इस बात से कवि के कलम से लिखे बोल, जो जन जीवन के बीच सालों तक ठहर जनप्रिय हो जाते हैं। वह राजाओं की तलवारों से श्रेष्ठ साबित होते है। इस बात पर विश्वास हो जाता है।
किताब बसंत पर है। लेकिन इस किताब का केंद्र बिंदु अमीर ख़ुसरो और निजामुद्दीन औलिया ही है। क्योंकि आज भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अमीर ख़ुसरो का लिखा ‘सकल बन फूल रही सरसों’ मौजूद है। प्रकृति का यह रूप तो ख़ुसरो के साथ आज भी हर अंतर्मन का स्वर हैं। जो धर्म, भाषा की सीमाओं को तोड़कर आज भी सबको आनंदित कर रहा है।
उर्दू और हिंदी में बसंत पर लिखी कविताओं का भी सोदाहरण संदर्भ दिया है। क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल जी ने लिखी 'मेरा रंग दे बसंती चोला' का जिक़्र यहाँ किया है। उस समय 'रंग दे बसंती' साहस और त्याग का रंग दर्शाता था। यह पंक्ति हमारे देश के लिए कुर्बानी देनेवाले क्रांतिकारी वीरों की हमेशा याद दिलाती है। बसंत की सारी विशेषताओं को समेटे यह किताब सभी आयुवर्ग के पाठकों को बसंत से जुड़े गीत,काव्य, चित्र, किस्से और संदर्भ स्त्रोतों की जानकारी देती है। फिल्मों में बसंत पर चित्रित अनेकों गीतों का ऊहापोह किया गया है।
किताब हमारे हिंदुस्तानी रंगों में रंगे गए आगंतुकों की उस समय की दास्ताँ भी है। खुशियाँ बांटने वाली और खुशियों को स्वीकार करने वाली हमारी साझा संस्कृति की याद दिलाती किताब पाठकों को अवश्य पसंद आएगी ऐसा विश्वास है।
लेखक यूसुफ़ सईद की तस्वीर घर नाम की वेबसाईट भी है। जिसको पाठक यहाँ देख सकते हैं। www.tasveerghar.net
https://www.yuvapravartak.com/2026/07/blog-post_546.html
नवीन जोशी, 14 अगस्त 2026, लखनऊ
सन 1980 की बात है या उसके एक-दो वर्ष पहले की, 'लखनऊ महोत्सव' की एक शाम सांस्कृतिक पण्डाल के मंच पर मलिका पुखराज उपस्थित थीं। उन दिनों वे अपनी बेटी ताहिरा और दामाद (नाम याद नहीं) के साथ पाकिस्तान से भारत के दौरे पर आई थीं। ऐसा भी याद पड़ता है कि शायद भारत सरकार ने उन्हें किसी सम्मान-पुरस्कार के लिए आमंत्रित किया था।
उन वर्षों में सरकारी आयोजन होने के बावजूद 'लखनऊ महोत्सव' बड़ी गरिमामय हुआ करता था। विशेष रूप से उसकी सांस्कृतिक संध्याओं में देश-विदेश के नामचीन कलाकार/संस्थाएं अपनी सर्वोत्तम प्रस्तुतियों से हमें चमत्कृत कर दिया करते थे।
तो, पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रमों पर प्रच्छन्न चुटीली टिप्पणियों के साथ अपने दामाद के संचालन में उस शाम मलिका पुखराज व ताहिरा ने कुछ बेहतरीन नगमे (अभी तो मैं जवान हूं, वगैरह) सुनाने के बाद अंत में वह गीत सुनाया जो उनकी पुरकशिश आवाज़ में आज भी कहीं सुनने को मिल जाता है तो जेठ की धूप वासंती हो जाती है- 'लो फिर बसंत आई, फूलों पे रंग लाई/ चलो बे-दरंग, लब-ए-आब-ए-गंग, बजे जल तरंग/ मन पर उमंग छाई...।'
हफीज़ जालंधरी का यह तराना गाया तो बहुत से गायकों ने है, और अच्छा गाया है लेकिन इसको जितनी प्रसिद्धि मलिका पुखराज की आवाज़ में मिली और पाकिस्तान में भी, वह बेमिसाल है।
उस जमाने तक पाकिस्तान, मुसलमान और इस्लाम का नाम लेना राष्ट्रद्रोह नहीं बनाया गया था। पाकिस्तानी कलाकार, खिलाड़ी, नेता और आम जनता भी भारत आया-जाया करते थे। तब यह भी संदेह और नफरत से नहीं देखा जाता था कि मुसलमान 'हमारा त्योहार बसंत' क्यों मनाते हैं।
वली दकनी की मजार को ध्वस्त करने वाली नफरत की फसल उगाए जाने में अभी 24-25 साल और लगने थे। उसके बाद तो इस देश में बहुत कुछ ध्वस्त किया जा चुका है। मुसलमान होना शक व नफरत से देखा जा रहा है।
शुक्र है कि दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह कायम है और वहां अब भी बसंतोत्सव मनाया जाता है। बहुत सारे कव्वाल, शायर और आम जन भी वासंती पटके गले या माथे में बांधकर बसंत के गीत गाते हैं और मजारों पर सरसों के फूल बिखेरे जाते हैं। कव्वाल जो समां बांधते हैं, उसके तो कहने ही क्या!
यह तनिक भावुक भूमिका वास्तव में यूसुफ सईद की किताब 'आज रच्यो है बसंत निजाम घर' के पन्ने पलटते और पढ़ते हुए मन में उमड़ती-घुमड़ती रही। यह किताब अभी-अभी नवारुण प्रकाशन से जारी हुई है, जो अपनी विषयवस्तु में ही नहीं, प्रस्तुति और साज-सज्जा में भी शानदार है। उसके रंगीन चित्र और रेखांकन अलग से ध्यान खींचते हैं। डिजायन और साज-सज्जा भी यूसुफ सईद ने ही की है।
किताब का मकसद काबिले गौर है- इस सवाल का जवाब तलाशना कि आखिर मुसलमान भारत का ऐसा त्योहार क्यों मनाते हैं जो हिंदू संस्कृति से जुड़ा है। यह सवाल बहुत से मुसलमान भी पूछते हैं, जो मानते हैं कि बसंत मनाने का चूंकि इस्लाम में कोई आधार नहीं है, इसलिए हराम है।
जवाब की तलाश में लेखक में हमें उस विरासत से परिचित कराता है जो हिंदुस्तान की धरती पर सैकड़ों-हजारों वर्षों में बहुत सारे धर्मों-संस्कृतियों से मिलकर धीरे-धीरे विकसित हुई और जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी है। वह ऐसी इंद्रधनुषी चादर है जिसके धागों और रंगों को अलग-अलग कर पाना सम्भव नहीं है। वह तार-तार हो सकती है, अलग नहीं।
आज के दौर में इस विरासत की चर्चा बहुत जरूरी है। पुरानी पीढ़ियां, जो इससे परिचित रही हैं, अब क्यों भूल रही हैं? नई पीढ़ियों को तो, जिन्हें नफरत घुट्टी की तरह पिलाई जा रही है, इसे जानना और भी जरूरी है।
कोई तीन दशक पहले 'बसंत' नाम से लघु फिल्म बना चुके यूसुफ सईद ने इस किताब में बसंत की परम्पराओं, गीतों और उसकी लोकप्रियता में मुस्लिम सूफियों, शायरों और कव्वालों, खासकर अमीर खुसरो (किताब में 'खुसरौ' है) के योगदान की गहरी पड़ताल की है-
'जब कुछ मुसलमान बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में हिंदुस्तान आए तो मध्य एशिया और खुरासान के नौरोज और फसले बहार की रंगीनियां शायद उन्हें यहां बसंत के रूप में नज़र आईं। इसलिए उन्होंने हिंदुस्तान के दूसरे त्योहारों के मुकाबले में बसंत को अपनेपन की भावना से मनाया। भारत के मुसलमानों में बसंत सबसे पहले चिश्ती सूफियों ने मनाया।'
और, यह किस्सा तो मशहूर ही है कि जब अपने भांजे तकीउद्दीन की मौत से गम में डूबे, हंसना-खाना भूल गए अपने पीर निजामुद्दीन औलिया को अमीर खुसरो ने महिलाओं की तरह सज-धजकर और हाथों में सरसों के फूल लेकर नाचते हुए हंसाया था। यह विचार उन्हें बसंत पंचमी पर पीले वस्त्रों में सजी, नाचती-गाती महिलाओं को देखकर सूझा था।
तबसे बसंत का यह पर्व निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो के साथ अभिन्न रूप से जुड़ता हुआ दूसरे कई सूफी पीरों के उत्सवों में शामिल हो गया। अमीर खुसरो के बसंत गीत लोकप्रिय होते गए और बसंत पर कव्वालियां और शायरी लिखने-गाने का सिलसिला चल पड़ा, जो आज तक जारी है और लोकप्रिय भी।
निजामुद्दीन औलिया की करीब सात सौ साल पुरानी दरगाह पर तो बसंत पंचमी के दिन देश भर के कव्वाल इकट्ठा होकर गीत-संगीत की धूम मचाते हैं। हौज़ में वासंती रंग घोला जाता है, कपड़े रंगे, बांटे और पहने जाते हैं। सरसों के फूल मजारों पर चढ़ाए जाते हैं। वैसे, यूसुफ अफसोस जताते हैं कि अब यह एक उत्सव की बजाय रस्म भर रह गया है।
यूसुफ पूछते हैं कि 'उनकी मृत्यु के सात सौ साल बाद एक फारसी कवि और दरबारी इतिहासकार का हमारे लिए क्या महत्त्व हो सकता है?' वे जवाब देते हैं कि 'अमीर खुसरो और उनके समय की व्याख्या करने की कोशिश सिर्फ उनकी कविता या संगीत की सराहना ही नहीं है, यह भारत के इतिहास को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है और हमारे अतीत के बारे में गलतफहमियों को दूर कर सकती है... क्योंकि आज हम भारत में ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहां इतिहास को बहुत बड़े पैमाने पर राजनीतिक अलगाव के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।'
यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात है और यही समझाने का बेहतरीन प्रयास यह किताब करती है।
यूसुफ बताते हैं कि इस्लाम के आने के बहुत पहले से लोग भारत आते रहे। स्वाभाविक ही उनके प्रभाव भी यहां पड़े लेकिन हिंदुस्तानी समाज में सबसे बड़ा सांस्कृतिक प्रभाव फारस (वर्तमान ईरान) से आए लोगों का पड़ा। बाद में दूसरी जगहों से आए मुसलमानों ने भी यहां की बहुत सी परम्पराओं को सहज ही अपना लिया।
कब्रों पर चादर चढ़ाना, चिराग जलाना, फूल व नज़राना पेश करना, कब्र पर सजदा करना, तावीज-गण्डे बांधना, वगैरह बहुत सी ऐसी रस्में उन्होंने हिंदुओं से सीखीं और अपना लीं। ये रस्में ईरान या अरब से नहीं आईं। सूफियों ने भी बसंत को इस्लाम के दायरे में अपनाया। इसी तरह हिंदुओं ने भी उनकी बहुत सी रस्में, खान-पान, पहनावे और बोली-भाषा के प्रभाव सहज ही ग्रहण किए।
यही मिली-जुली रवायत है, गंगा-जमुनी संस्कृति है, जो हजारों साल में बनी। आज कौन सी रस्में किसकी हैं, कैसी हैं और उनमें किस-किस के प्रभाव हैं, इसे अलग कर पाना तो दूर, समझ पाना भी कठिन है। इसी का नाम हिंदुस्तानियत या भारतीयता है। यह तथ्य समझना-समझाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। यह किताब यही काम बखूबी करती है।
किताब में खुसरो और अन्य सूफियों के रचे बसंत संबंधी गीतों का संकलन और उनकी व्याख्या भी शामिल है। रंगों के धार्मिक प्रतीकों पर रोचक अध्याय है, जिसमें अच्छी तरह समझाया गया है कि हरा रंग क्यों इस्लाम से जोड़ा जाता है और यह गलत धारणा क्यों बनी। फिल्मों में बसंत के चित्रण पर भी यहां चर्चा की गई है। दरबारी शायर के रूप में अमीर खुसरो की विरोधीभासी भूमिका की चर्चा करने से भी यूसुफ ने परहेज नहीं किया है।
यूसुफ यह भी बताते हैं कि बसंत की शायरी में जिस 'रंग' की बात होती है (आज रंग है, ऐ मां रंग है री, मेरे महबूब के घर रंग है री) , वह मात्र वासंती रंग नहीं है। वह असल में अपने पीर के साथ लगा इश्किया रंग है, जिसके बिना सूफियों की इबादत पूरी नहीं होती, वह इबादत जिसका उद्देश्य अंतत: अपने भगवान या खुदा तक पहुंचना है, उसमें फना हो जाना है।
सूफियों का उर्स (पुण्य तिथि पर उत्सव) मनाया ही इसलिए जाता है कि वे मरे नहीं, बल्कि ईश्वर में मिल गए। जैसे, ईश्वर से उनका विवाह हो गया। सूफी अपनी तुलना दुल्हन से करते हैं और परमात्मा दूल्हा हैं- 'मोहे अपने ही रंग में रंग ले रंगीले, तू तो साहेब मेरा महबूबे इलाही।' कबीर के यहां भी 'राम' दूल्हा हैं और वे खुद दुल्हन।
'आज जबकि हिंदू और मुसलमान दोनों ही कौमें अपने-अपने धार्मिक खोल में सीमित होती जा रही हैं, या सिमटने पर मजबूर की जा रही हैं, मुसलमानों का बसंत मनाना या हिंदुओं का ईद में शामिल होना एक ख्वाब सा बन गया है।' यूसुफ सईद की यह चिंता हम सबकी चिंता होनी चाहिए।
इसीलिए यह यह किताब हर घर में होनी और पढ़ी जानी चाहिए।
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Gaurav Atwal (Student, Nanakmatta Public School, Uttarakhand):
रज़ाई की गरमाहट अब कम होने लगी है, एक नया मौसम दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है।
हमने अपने गर्म लिबास तह करके महफ़ूज़ कर दिए हैं, और फ़िज़ा में बहार की आहट सुनाई देने लगी है।
जहाँ कल तक शाख़ें ख़ामोश थीं, आज पेड़-पौधे नई पोशाक से सजने लगे हैं।
हवा में अब सर्दियों की ख़ामोशी नहीं, बल्कि मिट्टी की ख़ुशबू और बहार की रवानी है।
मौसम बदल रहा है—और कुदरत फिर एक बार अपने नए रंगों में ख़ुद को सँवार रही है।
भारत में वसंत एक ऐसा मौसम होता है जहाँ प्रकृति अपनी सुंदरता के चरम पर होती है। पेड़-पौधों में नई-नई कोपलें फूटती हैं, हवा की रंगत और मिज़ाज कुछ बदला-बदला सा प्रतीत होता है। मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू हवा में जैसे इत्र घोल देती हो। साथ ही खेतों में पीली चादर-सी लहलहाती सरसों इस वातावरण को और मनोरम बना देती है।
लेकिन वसंत सिर्फ़ प्रकृति के बदलते स्वरूप को बयान नहीं करता, बल्कि हमारी संस्कृति और हमारे समाज के बीच की एकता और पारंपरिक संबंध को भी बयान करता है। इसका एक जीता-जागता उदाहरण सूफ़ी बसंत या बसंत पंचमी है, जिसकी हसीन मिसाल यूसुफ़ सईद अपनी किताब ‘आज रच्यो है बसंत निज़ाम घर’ में बताते हैं। यह किताब वसंत के दायरे को सीमित न रखते हुए उसके कई ऐसे रंगों को बयान करती है, जो आज शायद दिखाई या सुनाई नहीं देते हों।
आज के समाज में जहाँ हम कई चीज़ों को निचोड़ते या सिकोड़ते चले जा रहे हैं, चाहे वह समाज हो, त्योहार हो या कोई परंपरा हो, ऐसे में यह किताब उस सिकुड़न के बाहर जाकर एक ऐसे समाज के बारे में बताती है जहाँ न भेदभाव है और न ही कोई बैर-द्वेष, बस एक त्योहार को मनाने का जज़्बा और दो दोस्तों—निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरो—के बीच के प्रेम की कहानी, जिन्हें वसंत अपने रंगीन मिज़ाज से एक करता है। और ग़ौर-तलब बात यह है कि गहरे दुख में होने के बाद भी निज़ामुद्दीन औलिया अपने मित्र अमीर ख़ुसरो की बचकानी हरकतों और उनके द्वारा सरसों के फूल और वसंत के बारे में गीत गाते हुए देखकर खिलखिला उठते हैं।
यह किताब कई पुरानी परंपराओं को एक जगह संजोकर उनका एक बेहद ही अच्छा वर्णन करके उन्हें प्रस्तुत करती है। दो दोस्तों की कहानी के माध्यम से कई ऐसे सवालों की ओर ग़ौर फ़रमाती है, जो आज के समाज के लोगों के लिए जानना और उनके बारे में ख़याल करना ज़रूरी-सा लगता है।
क्या संगीत, कविता और उत्सव जैसी सांस्कृतिक चीज़ें मज़हबी दीवारों को पार कर सकती हैं?
क्या आज हम उन साझा परंपराओं को भूलते जा रहे हैं, जिनमें अलग-अलग समुदाय साथ शामिल होते थे?
क्या हमारी सांस्कृतिक पहचान सच में अलग-अलग मज़हबी खानों में बाँटी जा सकती है, या भारतीय संस्कृति सदियों से आपसी मेल-जोल से बनी है?
किताब के कुछ ऐसे अंग भी हैं, जिन्हें छुए बिना अगर हम आगे बढ़ जाएँ, तो यह सही नहीं होगा। जैसे एक सवाल यह पैदा होता है कि आज हम अमीर ख़ुसरो को क्यों पढ़ें? कुछ लोगों के हिसाब से अमीर ख़ुसरो लेखक थे, कुछ के हिसाब से कलाकार और संगीतकार, कुछ लोगों के लिए निज़ामुद्दीन की दरगाह के संत और विद्वानों के लिए फ़ारसी के कवि। एक ही आदमी के पास इतनी सारी खूबियाँ होने के कारण उनके विचार कई मायनों में काफ़ी अलग थे। इसी कारण से उन्हें विरोधाभासी कहा जाता है। कहीं वे हिंदू परंपराओं और उनकी आस्था का ज़िक्र करते हैं, तो कहीं उनकी कुछ परंपराओं पर सवाल भी उठाते हैं। वहीं दूसरी तरफ़ वे अपने आप को अलग-अलग सांस्कृतिक और धार्मिक प्रभावों से जुड़ा हुआ भी दिखाते हैं। शायद इसी वजह से ख़ुसरो को सिर्फ़ एक कवि या संगीतकार के रूप में देखना, उन्हें समझने के लिए काफ़ी नहीं है। उन्हें पढ़ना हमें अपने इतिहास को एक ही नज़रिए से देखने के बजाय उसके अलग-अलग पहलुओं पर सोचने, अपनी पुरानी धारणाओं पर सवाल करने और उनके सही अर्थ को समझने का मौक़ा देता है।
वसंत केवल हिंदी तक सीमित नहीं रहा। कई महान कवियों ने इसका दस्तावेज़ीकरण उर्दू में भी किया। यही कारण है कि बसंत के त्योहार को एक सीमित दायरे में क़ैद नहीं किया जा सकता। उर्दू की शुरुआती शायरी और सूफ़ी परंपराओं के बीच गहरा ताल्लुक़ रहा है। मध्य एशिया से आए सूफ़ियों और भारत के योगियों, साधुओं और तांत्रिकों के बीच ख़यालात का आदान-प्रदान हुआ और एक-दूसरे की ज़बान और अदबी रवायतों को समझने का सिलसिला भी आगे बढ़ा। इसी मेल-जोल से उर्दू और हिंदी की शायरी में भारत के मौसम, कुदरती मंज़रों और त्योहारों के रंग दिखाई देने लगे। यही कारण रहा कि कई उर्दू के महान शायरों ने वसंत का वर्णन अपनी शेरो-शायरी में किया। वसंत का रंगीन मिज़ाज कई गानों और क़व्वालियों में भी दिखाई देता है, जिसमें से सबसे महत्वपूर्ण क़व्वाली ‘सकल बन फूल रही सरसों’ को कई गायकों ने अपने गायन का हिस्सा बनाया।
इस किताब को पढ़ने के बाद मेरे लिए बसंत केवल एक मौसम या त्योहार नहीं रह गया, बल्कि यह हमारी साझा संस्कृति और आपसी मेल-जोल का प्रतीक बन गया है। ख़ुसरो को पढ़ते हुए मुझे समझ आया कि किसी व्यक्ति, भाषा या परंपरा को एक ही पहचान में बाँधना उसके कई रंगों को सीमित कर देना है। आज जब समाज में पहचान की दीवारें बढ़ती दिखाई देती हैं, तब ये पुरानी साझा परंपराएँ हमें फिर से साथ आने की याद दिलाती हैं। शायद संस्कृति की असली खूबसूरती इसी में है कि वह अलग-अलग भाषाओं, धर्मों और लोगों से मिलकर बनती है। और शायद बसंत की असली बहार भी यही है—जो रंगों के साथ-साथ लोगों के बीच मेल-जोल और मोहब्बत भी लेकर आए।
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"आज रच्यो है बसंत निजाम घर"
जो समझा सो कह पाया
-आतम
पहले कविता फिर खुसरो फिर निजाम घर
फिर बसंत। जिसका कोई न अंत
मुर्शीद का दुख देखा न जाये
उसे ढूंढ़ो, जो उपाय बताये
यह तो मुश्किल काम नहीं है
सरसों के कुछ फूल ले आयें।
कुदरत का करिश्मा देखो
फूल लिये जब खुसरो आये
देख देख मुर्शीद मुस्काये
आओ मिल के सेहरा गायें।
कुदरत मुर्शीद एक हुए जब
ख़ुशी से सगरे नैन भर आये
आब ओ हवा ने ली अंगड़ाई
आओ मिल के बसंत मनायें।
आओ मिल के बसंत मनायें।
***
तब से आज तक, कितने सौ साल बीत गये लेकिन जब मैं युसूफ़ सईद की ताज़ा किताब,
'आज रच्यो बसंत निजाम घर' पढ़ता हूं तो लगता है कल की बात है।
न जाने कितने बरसों से युसूफ़ सईद यह किताब लिख रहे थे। मेरी जानकारी में बीस पच्चीस बरस तो हो ही गये होंगे। जब से मैंने उनका बसंत पर लघु चित्रपट देखा, तब से हमारी दोस्ती हुई और मेरी जानकारी में तब ही से इस किताब के लिखने की शुरुआत भी हो चुकी थी।
कोई बात नहीं, देर आयद दुरुस्त आयद।
युसूफ़ सईद बधाई के पात्र हैं। बधाई हो दोस्त।
यह किताब हमें बहुत सारी उन बातों से अवगत करवाती है, जो सभ्यता और संस्कृति के सहज निर्माण में नींव की ईंट का काम करतीं हैं। ये बातें, फूलों, दिलों और इन्सान-दोस्ती की महफिलों से होती हुई, इश्क़ ए मजाज़ी से इश्क़ ए हक़ीक़ी के रास्तों पर चल कर, मानवीय रिश्तों की अटूट बुनियाद रखने में हमेशा काम आती रही हैं और आती रहेंगी। बसंत ऐसी ही एक बहुत बड़ी बात है। जैसे शरीर में प्राण।
किताब बताती है, सूफियों की दरगाहों पर बसंत मनाने की शुरुआत कैसे हुई। निजामुद्दीन औलिया और खुसरो के संबंध और सरसों के फूल किस तरह एक नई संस्कृति के उद्भव की वजह बने और इस वजह के पीछे उस वक्त की लोकाई का कितना बड़ा हाथ है।
यह तो हम सब जानते ही हैं कि खुसरो और लोकाई, इस तरह से एक दूसरे में हिल मिल चुके हैं कि इन्हें अलग करके देखना असंभव है।
किताब के शुरू के चार पांच अध्यायों में इस बात को सांगोपांग ढ़ंग से लिखा गया है। थोड़े में कहूं तो इस तरह कहूंगा कि शुरू के पांच अध्यायों में, औलिया, खुसरो, सरसों, लोकाई और सूफी तहज़ीब के आपसी रिश्तों की विकास यात्रा में गाये गये बसंत गीत, इश्किया रंगों की बौछार, खुसरो के फारसी गीतों और कविताओं का बेहतरीन खुलासा किया गया है। जिससे हमें इस बात का अंदाजा होता है कि युसूफ़ सईद के दिल और दिमाग दोनों पर बसंत का रंग कितना व्यापक और गहराई तक अपना असर कर चुका है। इस वक्त मुझे कबीर का प्रसिद्ध दोहा याद आ रहा है
स्याही रंग छुड़ाय के, दियो मजीठा रंग।
धोए से छूटे नाहिं, दिन-दिन होत सुरंग।
बहरहाल, किताब के इस पहले हिस्से में, निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो, इश्क़ ए हक़ीक़ी, सरसों और इनसे जुड़ी हुई काव्य रचनाओं के ऐतिहासिक जिक्र के साथ साथ युसूफ़ सईद की अपनी राय भी यदा कदा शामिल हुई है, जिससे किताब लिखने के पीछे की उनकी मंशा का अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकता है।
किताब के पहले हिस्से का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय एक बस्ती का इतिहास है। निजामुद्दीन औलिया, दिल्ली और वहां की हुकूमतों का सांस्कृतिक लेखा-जोखा। यह अध्याय किताब का शारीरिक ढांचा है जिसका हृदय बन जाता है दरगाह शरीफ और बसंत।
ऐसा लगता है दोनों एक दूसरे पर गहरी छाप भी छोड़ते हैं और आपसी तनातनी भी बनी रहती है। युसूफ सईद ने जो खाका खींचा है उसमें उस समय और आने वाले समय की तस्वीर साफ साफ दिखाई देती है। यह ऐतिहासिक भी है और मिथिहासिक भी। आस्था और हुकूमत। हुकूमत और पीर ओ मुर्शीद। बीच में अटूट सेतु है अवाम और उसकी मन्नतें।
किताब का दूसरा हिस्सा, जिसमें चार अध्याय हैं और चारों अलग अलग होते हुए भी एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। मसलन, हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में बसंत के ताल्लुक से हुई रचनाओं का आकलन और सरसरी जानकारी के साथ साथ, एक तरफ लोकाई से उनका संबंध और दूसरी तरफ सूफियों और कला के अन्य माध्यमों से उनका संबंध। मिसाल के तौर पर नासिर काजमी कहते हैं
"पिछले साल के मलाल दिल से मिट गये
ले के फिर नई चुभन बसंत आ गई*
इस तरह मुझे फ़ैज़ याद आ गये। अपनी कविता 'बहार' के आखिर में आप लिखते हैं
"बहार आई तो खुल गए हैं
नए सिरे से हिसाब सारे"
इस तरह इस अध्याय में, जो बहुत बड़ा और बहुत दिलचस्प है, जिसमें बसंत के ताल्लुक से हिंदी उर्दू की बेशकीमती कविताओं का जिक्र किया गया है। ज्यादा विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि कविता तो पढ़ने और आत्मसात करने पर ही वे ख़ुशी और बुद्धि में तब्दील होती है। इन पर बातचीत लाजमी होने पर भी यह दीगर बात है इसलिए यह अध्याय गहराई में जाकर पढ़ने की मांग करता है।
इसके अलावा राग संगीत और फिल्मों में जो कुछ भी बसंत आया, उनकी संक्षिप्त जानकारी और मिसालें दी गई हैं। मजेदार बात तो यह है कि बसंत ने किसी माध्यम को नहीं छोड़ा और न ही किसी शख्स को। यहां तक की इंकलाब का रंग भी बसंत ही है।
इस तरह मैं कह सकता हूं कि बसंत एक तहज़ीबी रंग है जो इंसान को एक तरफ कुदरत से मिलता है और दूसरी तरफ माशूक से। ठीक इसी तरह एक तरफ आस को ज़िंदा रखता है और दूसरी तरफ दुखों से लोहा लेने का औजार बन जाता है। थोड़ा और आगे जाकर कहूं तो कहूंगा कि बसंत, मोहब्बत का रंग है मोहब्बत के बारे में जिगर मुरादाबादी का शे'र क्यों न याद आये, सो यूं है :
*इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है"
फैले तो जमाना है।
यह किताब, "आज रच्यो है बसंत निजाम घर'
इसीलिए लिखी गई है कि निजाम के घर से निकला बसंत अवाम के दिलों में बसा रहे ताकि अवाम बेख़ौफ़ होकर बिना किसी वैरभाव और द्वेष के गले मिलता रहे। इसलिए इस और इस तरह की कई कई किताबों की जरूरत है।
इस किताब पर अपनी बात कहते हुए मैंने यह ध्यान रखा कि मैं उन उन बिंदुओं का जिक्र करूंगा जिन जिन बिंदुओं पर युसूफ़ सईद ने विस्तार से लिखा है, इसलिए जो लिखा है उसकी मिसालें न के बराबर दी ताकि पढ़ने वाले को लगे कि मेरे इशारों को अपनी स्वतंत्रता से पढ़ रहा है न कि मेरे बताये रास्ते पर चल कर।
बहरहाल, मैंने जानबूझ कर कुछ बातों का जिक्र करना जरूरी नहीं समझा मसलन, अमीर खुसरो को आज क्यों पढ़ें और दूसरी बात रंग और उसके धार्मिक प्रतीक। इसीलिए कि ये दोनों अध्याय पढ़े जाने चाहिए और इन पर पाठक अपनी राय खुद बनाये। लेकिन बेहतर बात यह है कि ये दोनो अध्याय, खास करके मैं कहूंगा, अमीर खुसरो क्यों पढ़ें, वाला अध्याय इस किताब की रगों में दौड़ता लहू है, जो सदियों से कमाई गई भारतीय संस्कृति की अमिट छाप है। इसीलिए इस अध्याय पर अलग से कुछ लिखा हुआ पढ़ने से बेहतर है मूल अध्याय ही पढ़ा जाना चाहिए।
अपनी बात को अल्प विराम देते हुए अब कहूंगा कि मेरी बात इस किताब की समीक्षा नहीं है बल्कि इस किताब का मुझ पर पड़े प्रभाव की एक बानगी है।
समीक्षा भी करूंगा लेकिन पहले इसके प्रभाव से उभर जाऊं।
अकबर इलाहाबादी की इस बात पर मैं अपनी बात को किसी और मौके के लिए मुल्तवी करता हूं
कि ----
"मैं चाहता हूं कि बस एक ही ख़याल रहे
मगर ख़याल से पैदा ख़याल होता है।"
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Pallav
आज रच्यो है बसंत निजाम घर
यह छोटी सी किताब बताती है कि हमारी भाषा में कितनी सुंदरता से सार्थक किताब बनाई जा सकती है। मैं सूफी साहित्य के बारे में अधिक नहीं जानता ऐसे में यह किताब भारत में सूफी संस्कृति के सुंदर प्रसंगों को मेरे जैसे पाठकों के लिए खोल देती है।
लेखक और प्रकाशक को बहुत बहुत बधाई।
https://www.facebook.com/photo/?fbid=10236690791153256&set=a.1166905176381
From Mamta Joshi (Bangalore):
इधर हिंदी पखवाड़ा शुरू हुआ, इतना अद्भुत संयोग कि मुझे आज ही एक खूबसूरत सौगात मिली-संजय जोशी के नवारूण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 'आज रच्यो है बसंत निजाम घर'।
यूसुफ़ सईद की लिखी किताब बसंत की महक, रंग और संगीत से लबरेज़ है ।कैसे हमारी वासंती परंपरा की पदचाप सूफी दायरों तक पहुँची ,उसमें पीर निजामुद्दीन औलिया और उनके मुरीद अमीर ख़ुसरो का कितना योगदान था, कितने पड़ाव हासिल करते करते मिर्ज़ा ग़ालिब, नज़ीर अकबराबादी की शायरी से लेकर शैलेंद्र और प्रेम धवन जैसे हिंदी सिनेमा से जुड़े गीतकारों तक के पूरे सफ़रनामें पर लेखक ने अपनी विहंगम दृष्टि डाली है और बसंत उत्सव के सागर को एक गागर में पेश किया है।
मैं खासकर किताब का आस्वादन इसलिए भी कर पाई कि इस्तेमाल किया गया फोंट आँखों पर ज़ोर नहीं डाल रहा था।
ऐसी उत्कृष्ट किताबें कोई प्रमाणपत्र नहीं चाहती पर किताब प्रेमियों को अपनी साझी विरासत पर गर्व हो,इसीलिए इस नायाब पुस्तक पर चर्चा सार्वजनिक होनी चाहिए ।लेखक और प्रकाशक के अतिरिक्त जो भी इस किताब के प्रकाशन से जुड़े है, सभी बधाई का पात्र हैं।
15 Sept. 2026
From Anshu Malviya, Prayagraj.
Aadab यूसुफ भाई
आपकी किताब एक रूहानी इत्र की shishi है. भीग गया.
शुक्रिया